अमेरिका व चीन के बीच आर्थिक युद्ध बना आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा ‘ट्रेड वार’

अमेरिका व चीन के बीच आर्थिक युद्ध बना आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा ‘ट्रेड वार’

अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वार के खतरनाक तरीके से आगे बढ़ने को लेकर भारत भी चिंतित है। सरकार के स्तर पर हालांकि यह माना जा रहा है कि अमेरिका व चीन अभी जिस तरह से एक दूसरे के कारोबारी हितों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं उससे भारत पर कोई असर नहीं पड़ेगा। लेकिन अगर दोनो देशों के बीच जल्द कोई समझौता नहीं होता है और दुनिया के दूसरे देश भी अपने उद्योगों को सुरक्षित करने और दूसरे देशों के उद्योगों को नुकसान पहुंचाने संबंधी कदम उठाते हैं तो इसका असर भारत पर ही पड़ना तय है।

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि अभी दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत भी अमेरिका के भावी कदम का इंतजार कर रहा है। अगर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी घोषणा के मुताबिक चीन से आयातित और उत्पादों पर आयात शुल्क की दर बढ़ाते हैं तो वह बेहद चिंताजनक होगा।

अमेरिका ने पहले कहा है कि वह चीन से आयातित 450 अरब डॉलर के आयात को महंगा करने का कदम उठा सकता है। इस तरह का कदम पूरी दुनिया के आर्थिक ताने बाने को चोट पहुंचा सकता है। ऐसा होने वाले आयात निर्यात व औद्योगिक उत्पादन का मौजूदा ढांचा बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो सकता है। केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के बीच इस बारे में पहले से ही चर्चा हो रही है। विदेश मंत्रालय के एक बड़े अधिकारी ने पिछले हफ्ते बताया था कि ट्रेड वार की स्थिति को लेकर लगातार दूसरे मंत्रालयों व विभिन्न देशों में भारतीय दूतावासों व मिशनों के साथ लगातार बातचीत चल रही है।

फायदे उठाने की स्थिति में नहीं भारत

चीन ने जिस तरह से अमेरिका से सोयाबीन आयात को महंगा करने के लिए टैक्स लगाये हैं उससे भारतीय सोयाबीन निर्यातकों के लिए वहां कुछ बाजार मिलने के आसार है, लेकिन चिंता की बात यह है कि भारत में सोयाबीन उत्पादन की स्थिति अभी बहुत उत्साहजनक नहीं दिखती। वर्ष 2017-18 में भारत में सोयाबीन उत्पादन 24 फीसद कम हुआ था।

चालू वित्त वर्ष में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में अच्छी बारिश होने से सोयाबीन उत्पादन बढ़ने के आसार हैं, लेकिन फसल आने में अभी कई महीने लग जाएंगे। उसी तरह से अमेरिका ने चीन के इलेक्ट्रॉनिक्स व उपभोक्ता उपकरणों पर टैक्स लगाने का सिलसिला शुरु किया है, लेकिन भारत में इनका कोई बड़ा उद्योग नहीं है जो चीन के विकल्प के तौर पर दावा पेश कर सके।