कोर्ट ने कहा- दो तरह की संभावना में अपीलकर्ताओं को दोषी ठहराना ठीक नहीं

कोर्ट ने कहा- दो तरह की संभावना में अपीलकर्ताओं को दोषी ठहराना ठीक नहीं

सीबीआई कोर्ट के जज एस लाल ने जब डॉ. राजेश तलवार और नूपुर तलवार को 14 साल की बेटी आरुषि और नौकर हमेराज की हत्या में दोषि ठहराया था तो उन्होंने यह नहीं सोचा होगा कि चार साल बाद यह फैसला पलट जाएगा. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सबूतों के अभाव में राजेश और नूपुर को बरी कर दिया.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साल 2008 के इस केस में नुपुर और राजेश तलवार को यह कहते हुए बरी कर दिया कि परिस्थितियां और सबूत उन्हें दोषी सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. उच्च न्यायालय के 263 पन्नों के फैसले ने नौ वर्षों से चल रहे इस केस को कम से कम फिलहाल के लिए समाप्त कर दी है.

सीबीआई अदालत के फैसले के खिलाफ तलवार दंपति की अपील को मंजूर करते हुए न्यायमूर्ति बी के नारायण और न्यायमूर्ति ए के मिश्रा की पीठ ने कहा, 'इस बात की प्रबल संभावना है कि किसी बाहरी व्यक्ति ने घटना को अंजाम दिया.' पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा, 'तथ्यों और रिकॉर्ड में दर्ज साक्ष्यों को देखकर हम पाते हैं कि न तो परिस्थितियां और न ही साक्ष्य सुसंगत हैं और परिस्थितियां घटना में अपीलकर्ताओं की संलिप्तता को दर्शाने के लिए कड़ियों को पूरा नहीं कर रही हैं.

पीठ ने कहा, 'ऐसी परिस्थिति में जब दो तरह की राय संभव है तो अपीलकर्ताओं को दोषी ठहराने वाला नजरिया अपनाना सही नहीं हो सकता है. कड़ियों को पूरा करने के लिये परिस्थितिजन्य साक्ष्य के अभाव में यह संदेह का लाभ अपीलकर्ताओं को देने का उपयुक्त मामला है.'

सीबीआई अदालत ने किसी भी मंशा के अभाव में तलवार दंपति को दोषी ठहराने के लिये परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर भरोसा किया था. अपने आदेश में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश श्याम लाल ने यह कहने के लिये उच्चतम न्यायालय के फैसलों का हवाला दिया था कि सिर्फ यह तथ्य कि अभियोजन आरोपी की मानसिक प्रवृत्ति को सबूतों में तब्दील करने में विफल रहा है, इसका मतलब यह नहीं है कि हमलावर के मन में इस तरह की मंशा नहीं थी.'

उन्होंने कहा था, 'परिस्थितिजन्य साक्ष्य के मामले में इरादे का बहुत अधिक महत्व नहीं होता है. मंशा के अभाव में परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि सिद्धांत रूप में की जा सकती है.' डासना जेल के जेलर दधीराम मौर्या ने कहा कि दंपति ने महसूस किया कि उन्हें न्याय मिला है.

हाईकोर्ट के डिविजन बेंच के जज जस्टिस बाल कृष्ण नारायण और जस्टिस एके मिश्रा ने कहा, ट्रायल जज को निष्पक्ष और पारदर्शी होना चाहिए. सामान्य विवेक के आदमी की तरह व्यवहार करना चाहिए. उन्हें अपनी कल्पना को अनंत तक नहीं खींचना चाहिए. ट्रायल में कानून का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए.

फैसले को मुख्य रूप से जस्टिस नारायन ने लिखा, जिसपर जस्टिस मिश्रा ने ठोस तर्क दिया और फैसले पर दोनों ने सहमति जताई. जस्टिस नारायण ने स्पष्ट रूप से कहा, भारतीय साक्ष्य अधिनियम के सेक्शन 106 अभियोजन को राहत नहीं देता है कि वह सभी उचित संदेह से परे जाकर इस केस को साबित करे. ट्रायल कोर्ट ने सेक्शन 106 और 114 पर भरोसा जताते हुए कहा, जब आरुषि और हेमराज की हत्या हुई उस समय सिर्फ तलवार दंपति घर पर थे इसलिए उनके खिलाफ मिल रहे तमाम सबूतों के खिलाफ उन्हें संतोषजनक स्पष्टीकरण प्रस्तुत करना पड़ा.