इन मामलों में भी ट्रायल कोर्ट के फैसले पर उठे हैं सवाल

इन मामलों में भी ट्रायल कोर्ट के फैसले पर उठे हैं सवाल

आरुषि मर्डर केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट से मिली बड़ी राहत के बाद राजेश और नुपुर तलवार सोमवार को गाजियाबाद के डासना जेल से रिहा होने वाले हैं. इस केस में सीबीआई कोर्ट ने तलवार दंपति को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. गुरुवार को हाईकोर्ट ने दोनों को सभी आरोपों से बरी कर दिया था.

तलवार दंपति 2013 से जेल में बंद थे. दोनों ने सजा के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील की थी. 12 अक्टूबर को हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला देते हुए सीबीआई कोर्ट के फैसले को पलट दिया. कोर्ट ने संदेह के लाभ के आधार पर राजेश और नुपुर तलवार को सभी आरोपों से बाइज्जत बरी कर दिया.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को इस तरह ना पलटा हो. इसके पहले अलग-अलग राज्यों के इन मामलों में कोर्ट निचली अदालत के फैसले पर सवाल उठा चुका है:-


1. बीएमडब्ल्यू हिट एंड रन केस

1999 के बीएमडब्ल्यू हिट एंड रन केस में पूर्व नेवी चीफ एसएम नंदा के पोते संजीव नंदा को दिल्ली ट्रायल कोर्ट ने दोषी करार दिया था. साल 2008 में ट्रायल कोर्ट ने कार से कुचलकर 6 लोगों की हत्या के आरोप में संजीव नंदा को 5 साल की सजा सुनाई थी. लेकिन, 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस केस में संजीव नंदा की सजा 2 साल कम कर दी थी. ट्रायल कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी. 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए कहा था कि संजीव नंदा का और जेल में रहने की जरूरत नहीं है.

2. शिवानी भटनागर मर्डर केस
साल 1999 में जर्नलिस्ट शिवानी भटनागर मर्डर केस में पूर्व आईपीएस ऑफिसर आरके शर्मा को दिल्ली सेशन जज ने दोषी करार दिया था. 2008 में ट्रायल कोर्ट ने आरके शर्मा समेत तीन और आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. हालांकि, 2011 में दिल्ली हाईकोर्ट ने आरके शर्मा को सभी आरोपों से बरी कर दिया. कोर्ट का कहना था कि सिर्फ संदेह के आधार पर किसी को आजीवन कारावास की सजा नहीं सुनाई जा सकती.
3. उपहार सिनेमा केस
1997 में साउथ दिल्ली के उपहार सिनेमा हॉल में हुए आग हादसे में 59 लोगों की मौत हो गई थी. इस दौरान मची भगदड़ में 100 से ज्यादा लोग जख्मी हुए थे. साल 2007 में दिल्ली की सीबीआई कोर्ट ने रियल एस्टेट टाइकून और उपहार के मालिक सुशील और गोपाल अंसल को दोषी करार देते हुए दो साल की सजा सुनाई थी. इसके अगले साल दिल्ली हाईकोर्ट ने सीबीआई कोर्ट के फैसले पर सवाल खड़े करते हुए अंसल ब्रदर्स की सजा एक साल कम कर दी.

4. नीतीश कटारा मर्डर केस
2002 के चर्चित नीतीश कटारा मर्डर केस में ट्रायल कोर्ट ने विकास और विशाल यादव को नीतीश के अपहरण और हत्या का दोषी करार दिया था. ट्रायल कोर्ट ने दोनों भाइयों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया. हाईकोर्ट ने विकास और विशाल यादव की आजीवन कारावास की सजा को 30-30 साल की सजा में तब्दील कर दी.

5. एसीपी त्यागी केस
1987 के एसीपी त्यागी डेथ केस में भी ऐसा ही हुआ था. पुलिस कस्टडी में एक अनुसूचित जाति के लड़के की मौत हो गई थी. दिल्ली सेशन कोर्ट ने इस मामले में पूर्व एसीपी आरपी त्यागी को दोषी करार देते हुए मौत की सजा सुनाई थी. पूर्व एसीपी ने सजा के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की. जिसके बाद हाईकोर्ट ने एसीपी की मौत की सजा को 8 साल कैद की सजा में तब्दील कर दिया था.

6. पार्सल बम केस
1982 के पार्सल बम केस में दिल्ली कोर्ट ने लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) एसजे चौधरी को बिजनेसमैन कृष्णन शिकंद की हत्या का दोषी करार दिया था. बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने सबूतों और गवाहों के अभाव में रिटायर्ड कर्नल पर से सारे आरोप हटा लिए थे.

7. प्रियदर्शनी मट्टू मर्डर केस
इसी तरह 1996 में प्रियदर्शनी मट्टू मर्डर केस में भी आरोपी संतोष सिंह को सीबीआई कोर्ट ने आरोपों से बरी कर दिया था. पीड़ित पक्ष ने हाईकोर्ट में अपील की थी. 2006 में हाईकोर्ट ने संतोष सिंह को दोषी करार देते हुए मौत की सजा सुनाई थी.